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Thursday, October 1, 2015

एक्सीडेंट हो गया ……!!!

मोनिका गुप्ता 
55 वर्षीय जुल्फी मियां घबराए हुए, चाय की दुकान की ओर चले आ रहे थे. चेहरा सुर्ख लाल,हाथ-पांव कांपते हुए मेरे पूछने पर कि चच्चा जान, क्या हुआ उन्होंने बताया कि मियां, आज तो पूछो ही मत ... एक्सीडेंट हो गया... !!! यार-दोस्त उनकी हालत देखकर घबरा गए । छोटू को चाय आर्डर किया और उन्हें कुर्सी पर बैठाकर खैर-खबर जाननी चाही कि आखिर हुआ कैसे कि इतने में सतीश बोल पड़ा, यार सड़क पर इतने गड्डें हैं, कोर्इ हाल है क्या, वहीं उलझ गए होंगे और एक्सीडेंट हो गया होना है और नही तो क्या !!!

मनप्रीत ने अपनी राय रखी, ओये! तेनू की पता …. ऐ लोकल बसैं होन्दी हैं ना उसदे ऊपर लटक-लटक के जान्दें ने लौकी ……. मैं तां कहदां हां कि जुल्फी मियां भी किसे बस इच लटक के जा रहे होंगे तैं उदैं विचों डिग पए होणगे । तभी विक्टर ने टोका, हे मार्इप्री, मनप्रीत गुस्से से बोला, ओए नां ठीक लया कर … अंग्रेजी दा पुत्तर…….गल करदा है … मैंने बात गिड़ते देख उनकी सुलह करवार्इ और विक्टर से पूछा तो उसने बताया कि वैरी सिम्पल, द ओनली रीजन इज मोबाइल यार ! पीपल टाक टू मच ओन मोबाईल वार्इल ड्रार्इविंग, आर्इ थिंक दिस इस द ओनली रिजन आफ एक्सीडेंट तभी तार्जन मेरा मतलब टार्जन अपनी तातली आवाज में बोला, मु…….. मुझे पता है……… तोर्इ गाय तामने अचानक आ दर्इ होगी । औल तुल्फी मियां चलक पल गिल पले होंदे।
तभी खुद को हीरो समझने वाला शहिद बोला, ओ कम ओन यार, यू नो, ये सब दोस्ती का चक्कर है. मोटरसाइकिल और स्कूटर चलाते समय एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं और गाना गाते सड़क पर अपना दुपहिया भगाते हैं । आर्इ थिंक, दिस इज द रिजन, फ्रेंडस ।
तभी कमल हकलाता हुआ बोला …..त ….त……त…..तुम…..स…. सब गलत हो…….! नेताओ काइ…….इतना ….स…. स….. सारा काफिला च…. च….. चलता ……. है ……. ब …..ब ….बस……. किसी …….. ग….. ग….. गाड़ी…… ने ठोक दि…. दि…. दिया होगा ! बे…. बे…. बेचारे …..जु….. जु…. जुल्फी मियां ……..! तभी मेरा ध्यान जुल्फी मियां की तरफ गया । चाय उनके हाथ में ज्यों की त्यों रखी थी और चाय में काली मलार्इ जम चुकी थी और वो मानो किसी दूसरी ही दुनिया मे खोए हुए थे.
हम सभी ने तुक्के लगाने की बजाय चच्चा से ही बात करना बेहतर समझा और गहरी सोच में डूबे जुल्फी मियां ने बताया कि उनका ए ए ए ए एक्सीडेंट हो गया. इसी बीच में छोटू गर्म चाय का नया गिलास देकर चला गया था । मैंने फिर पूछा कि कहीं बंद फाटक के नीचे से तो नहीं निकल रहे थे कि ट्रेन आ गर्इ हो । उन्होंने फिर से न की मुद्रा में सिर झटक दिया । हम सब हैरान परेशान हो चुके थे ना कोई चोट का निशान न कुछ पर चेहरे पर पूरे 12 बजे हुए थे आखिर माजरा है तो क्या !! जुल्फी मियां हमारी किसी भी बात से सहमत ही नहीं थे पर रट एक ही लगा रखी थी कि एक्सीडेंट हो गया। हम आपस में बातें करने लगे कि आजकल बस या जीप के ड्रार्इवर के पास लाइसेंस तो होता नहीं है बस ड्राइवर बन जाते हैं और तो और छोटे-छोटे बच्चे भी धड़ल्ले से स्कूटी, कार, मोटरसाइकिल चलाते हैं । वही पुलिस भी ले देकर बात रफा दफा कर देती है.
तभी, जुल्फी मियां ने चाय का गिलास मेज पर रखा और चिल्लाते हुए बोले नहीं, अम्मा यार, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । वो तो ….. वो तो….. राह से गुजरते वक्त चश्मेबददूर बानो हमें मिल गर्इ थी । हमारी उनसे और उनकी हमसे ….नजरें इनायत हुर्इ… और फिर चार हुई … बस समझो कि ऐसा एक्सीडेंट हुआ कि….. बस…..!! ये कहते हुए खुदा हाफिज करते हुए, मुस्कुराते हुए बाहर निकल लिए और हम सब अपना सिर पकड़ कर बैठ गए ।

हाय ये कैसा एक्सीडेंट !!!

Monica Gupta
Sirsa (Haryana)


Sunday, September 27, 2015

लोकतंत्र के लिए हादसे ज़रूरी हैं !


संतोष त्रिवेदी
कभी हादसों की वजह से मंत्री-पद खतरे में पड़ जाते थे पर अब स्वयं मंत्री हादसों को अपने लिए एक मौक़ा मानते हैं।वे इस इंतज़ार में रहते हैं कि कब हादसा हो और उन्हें जनता के साथ खड़े होने का सुयोग मिले।इस तरह वे सरकारी बजट को राहत-कार्य में बाँटकर अपना मंत्री बनना सार्थक कर सकें।कुछ ऐसे ही हृदयोद्गार व्यक्त किये हैं देश के हृदय-प्रदेश के बड़े मंत्री ने।एक बड़े हादसे के बाद जब उनसे पूछा गया कि इतनी मौतों का जिम्मेदार कौन है तो मंत्री जी ने बेलौस अंदाज़ में उत्तर दिया कि ये हादसे हैं और ये होते रहते हैं।अगर ये न हों तो जनता की सेवा करने का मौक़ा उनको कैसे मिलेगा !
हादसों को मौकों में बदलने वाले ऐसे लोग हमारे लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने में जुटे हैं।ऐसे लोगों का लोकतंत्र में प्रवेश किसी हादसे से कम नहीं।हमारे मुहल्ले का कल्लू पहलवान अखाड़ेबाजी में छोटे-बड़े दाँव आजमा लेता था।दैवयोग से एक दिन उसके दाँव से विरोधी की गरदन ने बाकी शरीर से जुड़े रहने की जिद त्याग दी।उसके घरवाले चिल्लाते रहे कि यह हत्या है पर पुलिस ने माना कि यह महज हादसा था।हादसे का संयोग मिलते ही कल्लू पहलवान सत्ताधारी दल में शामिल हो गए।उन्होंने इसे ईश्वर की ओर से दिया गया एक मौक़ा माना और आज वे प्रदेश के सुरक्षा मंत्री हैं।


लोकतंत्र की खूबी इसी में है कि नियमित अन्तराल पर ऐसे हादसे होते रहने चाहिए।इससे जनता के लिए बने बजट का कुछ हिस्सा उस तक पहुँचता ही है, राहत-राशि पहुँचाने से आपदा-राहत का पुनरभ्यास होता है सो अलग।मंत्री जनता के सामने खाली हाथ और बिना प्रयोजन के जाने लगें तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। मिले मौके का लाभ विरोधियों को लपकने भी नहीं देना चाहिए ! सरकार उनकी है,बड़े जोड़-जतन से बनी है तो लोगों को दिखनी भी चाहिए।हादसे के समय मंत्री जी का पीड़ित परिवार को ढांढस बँधाना और मातम से भरी भीड़ में अपनी मुस्कुराती पोज़ देना सबसे दुष्कर कार्य है।यूँ भी हादसा एक होता है और सरकार के मंत्री अनेक।गलती से हादसा कहीं और बड़ा हो गया तो मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के आगे मंत्री को मौक़ा गंवाना पड़ सकता है ! इसलिए जितने ज्यादा हादसे, उतनी अधिक कामकाजी सरकार।हादसों के बिना मौके का और बिना मौके के लोकतंत्र का भविष्य खतरे में दिखता है पर कुछ नासमझ इसे अवसरवाद से जोड़ देते हैं।यह गलत प्रवृत्ति है।


संतोष त्रिवेदी
जे 3/78 ए ,पहली मंजिल,
खिड़की एक्स.,मालवीयनगर
नई दिल्ली-110017